| :------भगवान श्रीकृष्णजी कहते हैं------- | |||
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| मैं अपने भक्तोंकी कठिन कठिन से परीक्षा लेता हूँ, | |||
| मैं उनके मुख से एक एक दाना छीन लेता हूँ, | |||
| उनका घर-परिवार छीन लेता हूँ, | |||
| उनका प्रत्येक सुख-चैन मैं छिन लेता हूँ, | |||
| मैं अपने भक्तों को आरों से कटवा देता हूँ, | |||
| तते खम्बों से लिपटा देता हूँ, | |||
| ऊंचे ऊंचे पर्वतों से गिरवा देता हूँ, | |||
| मैं अपने भक्तों की परीक्षा लेने में कोई दया नहीं करता! | |||
| मेरा भक्त फिर भी मेरा नाम नहीं त्यागता, | |||
| मैं अनेकों जन्मों तक ऐसी परीक्षा लेता रहता हूँ, | |||
| भक्त फिर भी मुझे नहीं छोड़ता, | |||
| मेरा ही भजन-नाम-ध्यान करता, | |||
| बस मुझे ही सब कुछ मानता है, | |||
| मुझे ही भजता है, | |||
| मेरे नाम के सिवा उनको कुछ भी प्यारा नहीं लगता | |||
| और मुझ पर ही अपना सब कुछ न्यौछावर कर देता है, | |||
| तब मैं उसको दर्शन देता हूँ! | |||
| मैं उसको अपने ह्रदय में स्थान देता हूँ! | |||
| मेरी माया कभी भी उसके पास नहीं जाती, | |||
| मेरे ह्रदय में रह कर समस्त मेरी लीलाओं को देखता है, | |||
| मैं उसे सब चिंताओं से मुक्त कर देता हूँ! | |||
| मेरे भक्त को भूख-प्यास, गर्मी-सर्दी की चिंता नहीं करते, | |||
| सोना-चांदी छल नहीं सकती, | |||
| निद्रा उसे सताती नहीं, | |||
| मेरे भक्त अपना सुख देकर | |||
| दूसरों के दुःख लेते हैं, | |||
| दूसरों को आराम की नींद सुला कर, | |||
| स्वयं रात-भर जागते रहते हैं! | |||
| मेरे भक्त मुझ से भी बड कर | |||
| मुझ को प्यारे लगते हैं, | |||
| त्याग किया हो जिसने सारा | |||
| मैं स्वयं उसको लेने आता हूँ! | |||
| मैं अपने भक्तों की परीक्षा बार-बार लेने आता हूँ! | |||
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